नई दिल्ली लोकसभा चुनाव के तहत देशभर में 542 संसदीय सीटों हुए मतदान की गिनती गुरुवार को सुबह आठ बजे शुरू हुई।2019 का लोकसभा चुनाव सात चरणों में लड़ा गया। 11 अप्रैल को पहले चरण के लिए वोट डाले गए तो 19 मई को आखिरी चरण का मतदान हुआ। पहले चरण में 91, दूसरे में 97, तीसरे में 117, चौथे में 71, पांचवें में 51 और छठे-सातवें में 59-59 सीटों पर वोट डाले गए। 543 सीटों में से कुल 542 सीटों पर ही मतदान हो पाया था, तमिलनाडु की वेल्लोर सीट पर सुरक्षा कारणों की वजह से मतदान टाला गया था।
लोकसभा चुनाव अपने अंतिम पड़ाव पर
पहुंच चुका है. रविवार को आख़िरी और सातवें चरण के मतदान के बाद अब सभी
मतदाताओं ने नेताओं की चुनावी किस्मत को बैलेट बॉक्स और ईवीएम में बंद कर
दिया है.
23 मई को जनता का जनादेश देश के सामने आएगा लेकिन आख़िरी
चरण के मतदान और नतीजों की तारीख़ के बीच एक और दिन सामने आता है और वो है
एग्ज़िट पोल का दिन.
मतदान के आख़िरी दिन वोटिंग की प्रक्रिया ख़त्म होने के आधे घंटे के भीतर तमाम न्यूज़ चैनलों पर एग्ज़िट पोल दिखाए जाने लगते हैं.
दरअसल, ये एग्ज़िट पोल आने वाले चुनावी नतीजों का एक अनुमान होता है और
बताता है कि मतदाताओं का रुझान किस पार्टी या गठगबंधन की ओर जा सकता है.
न्यूज़ चैनल तमाम सर्वे एजेसियों के साथ मिलकर ये कराते हैं.
ये सर्वे कई बार नतीजों से बिल्कुल मेल खाते हैं तो कभी उनके उलट होते हैं. ऐसे में हमने एग्ज़िट पोल की पूरी प्रक्रिया समझने की कोशिश की.
सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार कहते हैं कि एग्ज़िट पोल को लेकर जो
धारणा है वो है ये कि मतदाता जो वोट देकर पोलिंग बूथ से बाहर निकलते हैं
उनसे बात की जाती है.
सर्वे में कई सवाल मतदाता से पूछे जाते हैं
लेकिन उनमें सबसे अहम सवाल होता है कि आपने वोट किसे दिया है. हज़ारों
वोटर्स से इंटरव्यू करके आंकड़े जुटाए जाते हैं, इन आंकड़ों का विश्लेषण
करके ये वोटिंग का अनुमान निकालते हैं यानी ये पता लगाते हैं कि इस पार्टी
को कितने प्रतिशत वोटरों ने वोट किया है.
एग्ज़िट पोल करने, आंकड़े जुटाने और उन आंकड़ों को आप तक ले आने में एक लंबी मेहनत और प्रक्रिया होती है.
ऐसा नहीं है कि हर बार एग्ज़िट पोल सही ही साबित हुए हैं. इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव.
2015
में हुए बिहार विधानसभा चुनावों के बाद एग्ज़िट पोल में भाजपा के बंपर जीत
का अनुमान लगाया गया था. पोलिंग एजेंसी चाणक्य ने भाजपा को 155 और
महागठबंधन को महज 83 सीटों पर जीत की भविष्यवाणी की थी.
वहीं नीलसन और सिसरो ने 100 सीटों पर भाजपा की जीत का अनुमान लगाया था लेकिन नतीजे बिल्कुल विपरीत रहे थे.
जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के महागठबंधन ने कुल 243 सीटों में से 178 पर जीत हासिल की थी.
यह बड़ी जीत थी और एग्ज़िट पोल और असल नतीजों में काफ़ी अंतर देखने को मिला था.
आख़िर
एग्ज़िट पोल बड़े स्तर गलत कैसे हो जाते हैं? इस सवाल पर संजय कहते हैं,
”एग्ज़िट पोल के फ़ेल होने का सबसे बेहतर उदाहरण है 2004 का लोकसभा चुनाव.
इस चुनाव में एग्ज़िट पोल के आंकड़े ग़लत साबित हुए. एग्ज़िट पोल में कहा
जा रहा था कि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनेगी और एनडीए सबसे बड़ा गठबंधन
बनकर उभरेगा, लेकिन नतीजे हम सबको पता हैं. कांग्रेस की सीटें अधिक आईं और
यूपीए सबसे बड़ा गठबंधन साबित बना.”
2015 के बिहार चुनाव में ज़्यादातर एग़्ज़िट पोल के अनुमान ग़लत हुए थे.
”आप देखेंगे कि ज़्यादातर वहीं एग्ज़िट पोल फ़ेल हुए हैं जिनमें बीजेपी की जीत का अनुमान लगाया जाता है. एग्ज़िट पोल में हम पोलिंग बूथ से निकल कर बाहर आए मतदाताओं से बात करते हैं. ऐसे में जो मतदाता मुखर होता है वो ज़्यादा बातें करता है.”
‘आप देखेंगे कि बीजेपी का मतदाता ज़्यादातर शहरी, ऊंचे तबके का,
पढ़ा-लिखा, युवा होता हैं. आप देखेंगे कि सोशल कॉन्फ़िडेंस वाले लोग खुद
आकर अपनी बात रखते हैं. वहीं गरीब, अनपढ़ और कम अत्मविश्वास वाला मतदाता
चुपचाप वोट देकर चला जाता है. उसका सर्वे करने वालों तक खुद जाने की
संभावना कम होती है ऐसे में सर्वे करने वालों को ये ख्याल रखना ज़रूरी होता
है कि वह हर तबके के मतदाताओं से बात करे.”
मतदान को गुप्तदान कहा
जाता है, ऐसे में मतदाताओं से ये जान पाना कि वो किसे वोट देंगे ये भी एक
चुनौती होती है. कई बार वो सच बता रहे हैं या नहीं इस पर भी संशय होता है.
लेकिन
संजय इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखते वो कहते हैं कि ज़्यादातर मतदाता सच बोलते
हैं. ये हो सकता है कि कोई मतदाता झूठ बोल दे, मज़ाक कर दे लेकिन मैं नहीं
मानता कि जब किसी वोटर हम जाकर बात करते हैं तो उसे झूठ बोलने में कोई आनंद
आता है. मतदाता ने सच बोला या झूठ इसका फ़ैसला चुनाव नतीजों के बाद साफ़
हो जाता है. अगर आप पिछले 10-15 सालों के एग्ज़िट पोल को देखेंगे तो
करीब-करीब सभी एग्ज़िट पोल के अनुमान नतीजों के आगे-पीछे ही आए.
सही साबित हुए एग्ज़िट पोल
मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में दिसंबर 2018 में चुनाव नतीजे आए. तीनों राज्यों में कांग्रेस ने सरकार बनाई.
तीन
प्रमुख न्यूज़ चैनल्स- ‘इंडिया टुडे-आज तक’, रिपब्लिक टीवी और एबीपी के
अपने-अपने एग्जिट पोल में कांग्रेस को मध्य प्रदेश में जीतता दिखाया गया .
इन तीनों न्यूज़ चैनल्स ने क्रमश: एक्सिस इंडिया, सी-वोटर और सीएसडीएस से अपने अपने सर्वेक्षण कराए.
छत्तीसगढ़ के एग्ज़िट पोल के आकलन उलझे हुए दिखाए गए. ज़्यादातर चैनलों
के एग्ज़िट पोल मान रहे थे कि चुनाव नतीजे से छत्तीसगढ़ में त्रिशंकु
विधानसभा की स्थिति सामने आएगी.
सिर्फ़ एबीपी न्यूज़ और इंडिया टीवी के सर्वेक्षण बता रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में भाजपा लगातार चौथी बार सत्ता में आएगी और उसे कामचलाऊ बहुमत मिल जाएगा.
पर ‘इंडिया टुडे-आज तक’ और ‘रिपब्लिक टीवी’ जैसे चैनल छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस की बढ़त की भविष्यवाणी की थी.
2017 गुजरात विधानसभा चुनाव में भी नतीजे एग्ज़िट पोल
के रुझान एक जैसे ही थे. हालांकि कांग्रेस और बीजेपी की सीटों का अंतर बेहद
कम था लेकिन राज्य में बीजेपी की ही सरकार बनी.
इंडिया
न्यूज़-सीएनएक्स के एग्ज़िट पोल में गुजरात में भाजपा को 110 से 120 और
कांग्रेस को 65-75 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया था.
टाइम्स नाऊ-वीएमआर के एग्ज़िट पोल में भाजपा को 115 और कांग्रेस को 65 सीटें मिलती दिखाई गईं.
न्यूज़ 18-सीवोटर के एग्ज़िट पोल में भाजपा को 108 और कांग्रेस को 74 सीटें का अनुमान लगाया गया.
इंडिया टुडे-माय एक्सिस ने भाजपा को 99 से 113 और कांग्रेस को 68 से 82 सीटों का अनुमान दिया.
न्यूज़ 24- चाणक्य ने भाजपा को 135 और कांग्रेस को 47 सीटों का अनुमान जताया.
साल 2016 में पश्चिम बंगाल में चुनाव हुए थे. इस चुनाव के असल नतीजे एग्ज़िट पोल के काफ़ी क़रीब रहे थे.
चाणक्य
के एग्ज़िट पोल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के 210 सीटों पर जीत
के अनुमान लगाए थे. वहीं इंडिया टुडे-एक्सिस ने यह संख्या 243 बताई थी.
ये
सारे अनुमान सरकार बनाने के जादुई आंकड़ों से अधिक थे और कमोबेश ये सही भी
साबित हुए. ममता बनर्जी की पार्टी ने 211 सीटों पर जीत हासिल की थी.
हालांकि
सारे अनुमान दूसरे नंबर पर रही पार्टी के मामले में ग़लत साबित हुए.
एग्ज़िट पोल्स यह सटीक अनुमान नहीं लगा पाए कि उपविजेता कितनी सीटें
जीतेगा.
इंडिया टुडे-एक्सिस को छोड़कर सभी एग्ज़िट पोल लेफ़्ट और
कांग्रेस को 100 से अधिक सीट दे रहे थे, लेकिन असल नतीजों में लेफ़्ट और
कांग्रेस को महज़ 44 सीटें मिली थीं.
साल 2017 में उत्तर प्रदेश में
हुए विधानसभा चुनावों के बाद लगभग सभी एग्ज़िट पोल में भाजपा की जीत के
प्रबल अनुमान लगाए गए थे. और नतीजे भी ऐसे ही रहे.
बड़ी पार्टी कोई और सरकार किसी और की
कर्नाटक
में हुए विधानसभा चुनावों के असल परिणाम के कुछ महीने पहले कई राजनीतिक
वैज्ञानिकों ने तर्क दिया था कि विजेता की भविष्यवाणी के हिसाब से यह चुनाव
सबसे कठिन था.
एबीपी-सी वोटर ने 110 सीटों पर भाजपा के जीत के अनुमान लगाए थे, वहीं 88 सीटों पर कांग्रेस की जीत की भविष्यवाणी की गई थी.
दूसरी तरफ इंडिया टुडे-एक्सिस के एग्ज़िट पोल में 85 पर भाजपा और 111 सीटों पर जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन के जीत के अनुमान लगाए गए थे.
हालांकि
चुनावों के असल परिणाम अलग रहे. इसमें भाजपा को उम्मीद से अधिक सफलता मिली
थी. भाजपा 100 से ज़्यादा सीटों पर जीत का परचम लहराने में कामयाब रही थी,
हालांकि वो सरकार नहीं बना पाई.
चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस और जेडीएस गठबंधन की सरकार बनी.
प्रत्येक चुनाव परिणाम का सटीक अनुमान लगाना बेहद मुश्किल होता है.
संजय
कुमार मानते हैं कि कभी कभी एग्ज़िट पोल ग़लत होते हैं लेकिन इन्हें ऐसे
समझना चाहिए कि अगर नतीजों में एग्जिट पोल की सीटें सटीक नहीं आईं लेकिन
रुझान उसी ओर आया तो उसे ग़लत नहीं कहना चाहिए बल्कि वह भी सही एग्ज़िट पोल
ही होता है.
मतगणना से पहले ईवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को लेकर विपक्षी पार्टियों में अविश्वास का माहौल और बढ़ गया है. मंगवार को 22 विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग से संपर्क कर ईवीएम को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी.
हालांकि चुनाव आयोग ने विपक्षी पार्टियों के आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया. क्या मतदान केंद्र से स्ट्रॉन्ग रूम तक की यात्रा में वाक़ई ईवीएम की सुरक्षा चिंताजनक होती है? क्या चुनाव आयोग के चक्रव्यू को भेदना इतना आसान है? जानिए ईवीएम की सुरक्षा में चूक चुनाव आयोग की हो रही है प्रत्याशियों की सतर्कता में कमी है?
स्ट्रॉन्ग रूम कितना स्ट्रॉन्ग
स्ट्रॉन्ग रूम का मतलब है कि वैसा कमरा जहां की सुरक्षा अचूक है और अनाधिकारिक लोगों की पहुंच असंभव है. भारतीय चुनाव में स्ट्रॉन्ग रूम का मतलब निष्पक्ष और पारदर्शी मतदान और वोटों की गिनती से है.
मतदान के बाद ईवीएम स्ट्रॉन्ग रूम में रखी जाती है और इनकी सुरक्षा के लिए चुनाव आयोग पूरी तरह से चाक-चौबंद रहता है. देश भर की स्ट्रॉन्ग रूम में ईवीएम की सुरक्षा चुनाव आयोग तीन स्तरों पर करता है.
इसकी सुरक्षा के लिए केंद्रीय अर्द्ध सैनिक बलों की तैनाती रहती है. केंद्रीय बल स्ट्रॉन्ग रूम के भीतर की सुरक्षा देखते हैं जबकि बाहर की सुरक्षा राज्य पुलिस बलों के हाथों में होती है.
निगरानी कितनी कड़ी?
स्ट्रॉन्ग
रूम की सुरक्षा की निगरानी ज़िले के डीएम और एसपी के हाथों में होती है.
स्ट्रॉन्ग रूम की सीलिंग के वक़्त राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि मौजूद
रहते हैं. इन प्रतिनिधियों को भी अपनी तरफ़ से सील लगाने का प्रावधान होता
है.
स्ट्रॉन्ग रूम में केवल एक तरफ़ से एंट्री होनी चाहिए और इसमें
डबल लॉक सिस्टम होता है. एक चाबी रिटर्निंग ऑफिसर के पास होती है और दूसरी
चाबी संबंधित लोकसभा क्षेत्र के असिस्टेंट रिटर्निंग ऑफिसर के पास होती है.
अगर किसी स्ट्रॉन्ग रूम कोई दूसरी एंट्री है, वो चाहे खिड़की ही
क्यों न हो तो इसे सुनिश्चित करना होता है कि इससे किसी की पहुंच स्ट्रॉन्ग
रूम तक ना हो.
कैमरे का पहरा
स्ट्रॉन्ग
रूम के एंट्री पॉइंट पर सीसीटीवी कैमरा होता है. सुरक्षा बलों के पास एक
लॉग बुक होती है जिसमें हर एंट्री का टाइम, तारीख़, अवधि और नाम का उल्लेख
अनिवार्य रूप से करना होता है.
वो चाहें पर्यवेक्षक, एसपी, राजनीतिक
पार्टी, प्रत्याशी, एजेंट या कोई अन्य व्यक्ति हो. अगर काउंटिंग हॉल
स्ट्रॉन्ग रूम के पास है तो दोनों के बीच एक मज़बूत घेरा होता है ताकि
स्ट्रॉन्ग रूम तक कोई चाहकर भी पहुंच न सके.
इन सारे मानकों का पालन
हर हाल में करना होता है तभी चीज़ें आगे बढ़ती हैं. अगर काउंटिंग हॉल और
स्ट्रॉन्ग रूम के बीच ज़्यादा दूरी है तो दोनों के बीच बैरकेडिंग होनी
चाहिए और इसी के बीच से ईवीएम काउंटिंग हॉल तक पहुंचनी चाहिए.
वोटों
की गिनती के दिन अतिरिक्त सीसीटीवी कैमरे लगाए जा सकते हैं. स्ट्रॉन्ग रूम
से काउंटिंग हॉल तक ईवीएम ले जाने को रिकॉर्ड किया जाएगा ताकि कोई फेरबदल
ना हो. स्ट्रॉन्ग रूम और काउंटिंग हॉल की लोकेशन को लेकर भी कई मानक हैं.
बेसमेंट, उसके पास कोई छत, किचन या कैंटीन, पानी टंकी और पंप रूम नहीं होने चाहिए. इसके अलावा सभी प्रत्याशियों को लिखित में सूचित किया जाता है कि वो अपने प्रतिनिधि को भेजकर सुनिश्चित हो जाएं कि स्ट्रॉन्ग रूम सुरक्षित है.
चुनाव के पहले ईवीएम कहां होती है?
एक
ज़िले में उपलब्ध सभी ईवीएम डिस्ट्रिक्ट इलेक्टोरल ऑफिसर (डीईओ) की
निगरानी में गोदाम में रखी होती है. गोदाम में डबल लॉक सिस्टम काम करता है.
गोदाम की सुरक्षा में पुलिस बल हमेशा तैनात रहते हैं. इसके साथ ही
सीसीटीवी सर्विलांस भी रहता है.
चुनाव से पहले गोदाम से एक भी ईवीएम
चुनाव आयोग के आदेश के बिना बाहर नहीं जा सकती है. चुनाव के वक़्त ईवीएम
की जांच पहले इंजीनियर करते हैं और यह जांच राजनीतिक पार्टियों के
प्रतिनिधियों की मौजूदगी में होती है.
चुनाव की तारीख़ क़रीब आने के
बाद ईवीएम बिना कोई क्रम के आवंटित की जाती है. इस वक़्त अगर राजनीतिक
पार्टी के प्रतिनिधि मौजूद नहीं होते हैं तो आवंटित ईवीएम और वीवीपीएटी की
लिस्ट राजनीतिक पार्टियों के कार्यालयों को सौंप दी जाती है. इसके बाद
रिटर्निंग ऑफिसर की ज़िम्मेदारी स्टोर रूम और चिह्नित स्ट्रॉन्ग रूम की
होती है.
अलग-अलग मतदान केंद्रों पर ईवीएम का आवंटन पार्टी
प्रतिनिधियों की मौजूदगी में होती है. सारी ईवीएम मशीनों के सीरियल नंबर को
पार्टियों से साझा किया जाता है. मतदान शुरू होने से पहले ईवीएम के नंबर
का मिलान राजनीतिक पार्टियों के एजेंटों की मौजूदगी में की जाती है.
जब
सारी मशीनें बैलट और कैंडिडेट्स के नामों और चुनाव चिह्नों से लैस हो जाती
हैं तो स्ट्रॉन्ग रूम को पार्टी प्रतिनिधियों की मौजूदगी में सील कर दिया
जाता है. एक बार स्ट्रॉन्ग रूम बंद होने के बाद तभी खुलता है जब मतदान
केंद्रों पर ईवीएम पहुंचाई जाती है.
जब ईवीएम मतदान केंद्र के लिए रवाना की जाती है तो सभी राजनीतिक पार्टियों को सूचित किया जाता है. उनके साथ टाइम और तारीख़ को साझा किया जाता है. कुछ अतिरिक्त ईवीएम भी रखी जाती है ताकि कोई तकनीकी ख़राबी आने की सूरत में मशीन बदली जा सके.
मतदान केंद्र से स्ट्रॉन्ग रूम ईवीएम कैसे पहुंचती है?
मतदान
ख़त्म होते ही मतदान केंद्र से तत्काल ईवीएम स्ट्रॉन्ग रूम नहीं भेजी जाती
है. प्रीज़ाइडिंग ऑफिसर ईवीएम में वोटों के रिकॉर्ड का परीक्षण करता है.
सभी प्रत्याशियों के पोलिंग एजेंट को एक सत्यापित कॉपी दी जाती है.
इसके
बाद ईवीएम को सील कर दिया जाता है. प्रत्याशियों या उनके पोलिंग एजेंट सील
होने के बाद अपना हस्ताक्षर करते हैं. प्रत्याशी या उनके प्रतिनिधि मतदान
केंद्र से स्ट्रॉन्ग रूम ईवीएम के साथ जाते हैं.
अतिरिक्त ईवीएम भी
इस्तेमाल की गई ईवीएम के साथ ही स्ट्रॉन्ग रूम तक आने चाहिए. जब सारी ईवीएम
आ जाती है तो स्ट्रॉन्ग रूम सील कर दी जाती है. यहां प्रत्याशियों के
प्रतिनिधि को अपनी तरफ़ से भी सील लगाने की अनुमति होती है.
इसके
साथ ही प्रत्याशियों को स्ट्रॉन्ग रूम की देखरेख की अनुमति होती है. एक बार
स्ट्रॉन्ग रूम सील होने के बाद गिनती के दिन की सुबह ही खोला जाता है. अगर
विशेष परिस्थिति में स्ट्रॉन्ग रूम खोला जा रहा है तो यह प्रत्याशियों की
मौजूदगी में ही संभव हो पाएगा.
साउथ दिल्ली से ‘आप’ उम्मीदवार राघव चड्ढा ने एक्ज़िट पोल के उलट जीत का दावा किया है. राघव चड्ढा ने कहा, पिछले कई चुनाव में एग्ज़िट पोल के उलट परिणाम आए हैं.
लोकसभा चुनाव के लिए मतदान संपन्न होने के बाद आए एग्ज़िट पोल से विपक्ष
में अफरा तफरी देखने को मिल रही है. ऐसा ही कुछ आम आदमी पार्टी में भी
देखने को मिल रहा है. साउथ दिल्ली से ‘आप’ उम्मीदवार राघव चड्ढा ने एक्ज़िट
पोल के उलट जीत का दावा किया है.
राघव चड्ढा ने कहा, पिछले कई चुनाव में एग्ज़िट पोल के उलट परिणाम आए
हैं. हालांकि जीत के दावे के बीच राघव ने भाजपा पर एक बड़ा आरोप लगाया है.
‘आजतक’ से बातचीत के दौरान एग्ज़िट पोल सवाल खड़े करते हुए राघव चड्ढा ने
कहा कि “बीजेपी 1998 से अबतक हर Exit पोल जीतते आई है, लेकिन कई चुनाव हारी
है.”
“भाजपा के मतदाता को हमेशा ज्यादा और आम आदमी पार्टी के मतदाता को कम
आंका जाता है. 2013 में 6 सीटें बताईं लेकिन आईं 28, 2014 लोकसभा में शून्य
सीटें बताईं लेकिन आईं 4 सीटें, 2015 विधानसभा में 25 सीट बताईं लेकिन 70
में से 67 सीट आईं.”
राघव ने आगे बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा, “2019 में वोट डालने के
बाद मतदाता से पूछा जाता है तो मतदाता घबरा जाता है, इस घबराहट में मतदाता
बीजेपी को वोट देने की बात कहता है लेकिन वो बीजेपी को वोट देता नहीं है,
ये डर बीजेपी सरकार ने मतदाता के दिमाग मे डाल दिया है.”
दिल्ली के एग्जिट पोल में हार नज़र आने के सवाल पर राघव चड्ढा ने 23 मई
का इंतज़ार करने की बात कही. राघव ने कहा, “अभी नतीजों का इंतजार करना
चाहिए, हर राजनीतिक दल का एक आकलन होता है कि कहां से वोट आए, कहां गए.
मेरा मानना है कि 23 मई को रिजल्ट आने के बाद एग्ज़िट पोल को चुल्लू भर
पानी में डूबना पड़ेगा. हम 11 महीने ज़मीन पर रहे हैं, दिल्ली में कई आंकड़े
गलत साबित होंगे, तन मन धन से काम किया है और जमीन पर रिश्ते बनाए हैं.”
हालांकि बातचीत के अंत में राघव EVM पर सवाल खड़े करना नहीं भूले.
उन्होंने बीजेपी पर बड़ा आरोप लगाते हुए कहा, “ममता बनर्जी ने गंभीर बात कही
है कि Exit पोल में भाजपा की ज्यादा सीट दिखाकर एक हवा बना दी जाए और पीछे
से EVM मशीन बदल दी जाए और जब नतीजे आएं तो कोई EVM पर सवाल न खड़ा कर सके.
EVM मशीन बदलने के लिए, EXIT पोल को आधार बनाया गया है. चुनाव जीतने के
लिए बीजेपी हर गैर कानूनी काम कर रही है, चाहे मशीन से छेड़छाड़ हो या मशीन
बदलना हो.”
आपको बता दें कि दिल्ली में 12 मई को लोकसभा चुनाव हुए थे. इसके बाद 19
मई को अंतिम चरण का चुनाव ख़त्म होने के बाद सामने आए एग्जिट पोल में आम
आदमी पार्टी दिल्ली की सातों सीटों पर काफी पीछे नज़र आ रही है. हालांकि
बीजेपी जहां एग्जिट पोल से खुश है तो वहीं, विपक्षी दल एग्जिट पोल को गलत
ठहराते हुए 23 मई का इंतज़ार कर रहे हैं.
20 मई 2019
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— ANI UP (@ANINewsUP) May 20, 2019
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पुणे: जाधव वाड़ी बांध में डूबने से 3 मुंबई निवासियों की मौत, 3 अन्य को बचाया गया
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IST 12:07 AM
कई एग्जिट पोल के नतीजों में एक बार फिर एनडीए सरकार का अनुमान
ऐक्सिस माय इंडिया के एग्जिट पोल में कई वीआईपी सीटों पर कड़ी टक्कर
अमेठी में राहुल गांधी और सुलतानपुर में मेनका की सीट पर कांटे का मुकाबला
बागपत में जयंत चौधरी की सीट भी फंसी, कन्नौज में हार सकती हैं डिंपल यादव
लखनऊ लोकसभा चुनाव के नतीजे तो 23 मई को आने हैं लेकिन एग्जिट पोल के नतीजों के बाद सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष हर कोई रणनीति बनाने में जुटा है। उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटों के लिए बीजेपी और एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन में जबर्दस्त टक्कर है। कुछ एग्जिट पोल में अनुमान लगाया गया है कि यूपी में मायावती और अखिलेश की जोड़ी कमाल नहीं दिखा पाएगी। इस चुनाव में बीएसपी सुप्रीमो मायावती के साथ आरएलडी अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह का सियासी वजूद भी दांव पर लगा है। ऐक्सिस माय इंडिया के एग्जिट पोल में कई हाई प्रोफाइल सीटों पर चौंकाने वाले नतीजों का अनुमान लगाया गया है। अमेठी में राहुल गांधी को स्मृति इरानी कड़ी टक्कर दे रही हैं, वहीं मैनपुरी में एसपी संरक्षक मुलायम सिंह यादव की राह आसान नहीं है। इस एग्जिट पोल के मुताबिक चौधरी अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी भी कांटे के मुकाबले में फंस गए हैं। एक नजर ऐसी ही कुछ सीटों पर:
अमेठी
ऐक्सिस माय इंडिया के पोल के मुताबिक अमेठी में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और स्मृति इरानी के बीच कांटे की टक्कर है। 2014 के चुनाव में राहुल से हारने के बावजूद स्मृति यहां लगातार सक्रिय रही हैं। पिछली बार अमेठी में राहुल की जीत का अंतर गिरकर 1.07 लाख तक पहुंच गया था।
मैनपुरी
मैनपुरी सीट पर एसपी संरक्षक मुलायम सिंह यादव ने ऐलान किया था कि वह अपना आखिरी चुनाव लड़ रहे हैं। यादव परिवार का यह सीट गढ़ है और मुलायम कभी इस संसदीय सीट से नहीं हारे है। इस बार बीजेपी ने प्रेम सिंह शाक्य को उनके खिलाफ उतारा है। एग्जिट पोल के मुताबिक शाक्य मुलायम को अच्छी टक्कर दे रहे हैं। 2014 में मुलायम ने यहां से 3.64 लाख लोटों से जीत हासिल की थी।
कन्नौज
कन्नौज में एसपी अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव चुनाव लड़ रही हैं। एग्जिट पोल के मुताबिक डिंपल यह सीट गंवा सकती हैं। बीजेपी ने एक बार फिर यहां से सुब्रत पाठक को उतारा है। 2014 के चुनाव में डिंपल ने बमुश्किल 29 हजार से ज्यादा मतों से सुब्रत को शिकस्त दी थी।
पढ़ें: Exit Polls: यूपी में माया-अखिलेश की जोड़ी फेल!
सुलतानपुर
सुलतानपुर सीट पर बीजेपी ने इस बार वरुण गांधी की जगह मेनका गांधी को उतारा है। ऐक्सिस माय इंडिया के एग्जिट पोल के मुताबिक यहां मेनका गांधी एक मुश्किल मुकाबले में फंस गई हैं। उन्हें बीएसपी के चंद्रभद्र सिंह सोनू से कड़ी टक्कर मिल रही है। कांग्रेस ने यहां से डॉ. संजय सिंह को टिकट दिया था।
मुजफ्फरनगर
वेस्ट यूपी की सबसे चर्चित सीट मुजफ्फरनगर में इस बार जबरदस्त टक्कर बताई जा रही है। एग्जिट पोल के मुताबिक यहां आरएलडी सुप्रीमो अजित सिंह और बीजेपी के संजीव बालियान में टफ फाइट है। बालियान ने पिछली बार का चुनाव 4 लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीता था।
बागपत
चौधरी अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी इस बार मथुरा की बजाए अपने परिवार की बागपत सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। बीजेपी ने एक बार फिर डॉ. सत्यपाल सिंह को उतारा है। सत्यपाल और जयंत के बीच यहां कड़ी टक्कर है। बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में सत्यपाल सिंह ने चौधरी अजित सिंह को शिकस्त दी थी। चुनाव में अजित सिंह तीसरे नंबर पर रहे थे।
पढ़ें: Exit Polls: पहली बार बीजेपी जा सकती है 300 पार
फिरोजाबाद
फिरोजाबाद सीट पर यादव परिवार के बीच घमासान का फायदा बीजेपी को मिल सकता है। यहां एसपी महासचिव राम गोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव के खिलाफ उनके चाचा शिवपाल यादव अपनी नई पार्टी (प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया) से चुनाव लड़ रहे हैं। एग्जिट पोल के मुताबिक यहां से बीजेपी के चंद्रसेन जादौन जीत सकते हैं।
बदायूं बदायूं में मुलायम सिंह के भतीजे धर्मेंद्र यादव की सीट भी हाथ से निकलती दिख रही है। धर्मेंद्र के खिलाफ बीजेपी ने यूपी के कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी संघमित्रा मौर्य को उतारा था। वहीं, कांग्रेस ने सलीम इकबाल शेरवानी को टिकट दिया था। एग्जिट पोल की मानें तो धर्मेंद्र के वोट शेयर में सेंध लगी है। पिछली बार वह 1.66 लाख से ज्यादा मतों से विजयी रहे थे।
चुनाव आयोग ने चार मई को कहा कि मोदी ने गुजरात के पाटन
में 21 अप्रैल को दिए अपने भाषण में आचार संहिता का उल्लंघन नहीं किया था।
प्रधानमंत्री ने कहा था कि उनकी सरकार ने भारतीय वायु सेना के विंग कमांडर
अभिनंदन वर्थमान की सुरक्षित रिहाई सुनिश्चित करने के लिए पाकिस्तान को
मजबूर कर दिया था।
नई दिल्ली: चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अध्यक्ष अमित शाह को क्लीन चिट देने पर अपनी असहमति के कारण के आदर्श आचार संहिता से संबंधित बैठकों से खुद को दूर रखने का निर्णय लिया है। सूत्रों ने यह जानकारी दी।
सूत्रों से पता चला है कि चुनाव आयुक्त लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को एक पत्र लिखा है जिसमें उन्होंने कहा है कि अल्पसंख्यक निर्णयों को रिकॉर्ड नहीं किया जा रहा है इसलिए वे पूर्ण आयोग की बैठकों से दूर रहने के लिए मजबूर हैं।
उन्होंने इसी महीने के पहले सप्ताह से आदर्श आचार संहिता से संबंधित सभी
बैठकों से खुद को दूर रख लिया है। लवासा ने अपने पत्र में जोर देकर कहा कि
वे बैठकों में तभी शामिल होंगे जब उनके अल्पसंख्यक निर्णयों को आयोग के
निर्णयों में शामिल किया जाए।
सूत्रों ने कहा कि लवासा ने
प्रधानमंत्री के चार भाषणों और अमित शाह के एक भाषण को क्लीन चिट दिए जाने
के निर्णय पर असहमति जताई थी। 2:1 के बहुमत वाले पूर्ण आयोग ने भाषणों में
आचार संहिता का उल्लंघन नहीं पाया था।
चुनाव आयोग ने चार मई को कहा
कि मोदी ने गुजरात के पाटन में 21 अप्रैल को दिए अपने भाषण में आचार संहिता
का उल्लंघन नहीं किया था। प्रधानमंत्री ने कहा था कि उनकी सरकार ने भारतीय
वायु सेना के विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान की सुरक्षित रिहाई सुनिश्चित
करने के लिए पाकिस्तान को मजबूर कर दिया था।
यह उनका छठा भाषण था
जिसे चुनाव आयोग द्वारा क्लीन चिट दी गई। आयोग ने महाराष्ट्र के नांदेड़
में मोदी के उस भाषण में भी कुछ गलत नहीं पाया जिसमें उन्होंने कथित रूप से
कांग्रेस को डूबता जहाज बताया था।
इससे पहले चुनाव आयोग ने वर्धा
में एक अप्रैल को मोदी के उस भाषण को भी क्लीन चिट दे दी थी जिसमें
उन्होंने केरल की अल्पसंख्यकों की बहुलता वाली सीट से चुनाव लड़ने के लिए
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर हमला बोला था।
चुनाव आयोग ने 9 अप्रैल को लातूर में पहली बार वोट डालने जा रहे मतदाताओं से पुलवामा के शहीदों के नाम अपना वोट समर्पित करने की उनकी अपील पर भी उन्हें क्लीन चिट दे दी थी।
लोकसभा चुनाव 2019: उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की डुमरियागंज संसदीय सीट (Domariyaganj Lok Sabha Elections 2019) के इतिहास, पूर्व सांसदों तथा मौजूदा सांसद के बारे में जानिए.
उत्तर प्रदेश की डुमरियागंज लोकसभा सीट (Domariyaganj Lok Sabha
Elections 2019) 2014 के चुनाव में BJP के जगदम्बिका पाल 2,98,845 वोट पाकर
चुनाव जीते थे. वहीं दूसरे स्थान पर BSP के मोहम्मद मुकीम रहे, जिन्हें
1,95,257 वोट मिले.
इस लोकसभा क्षेत्र में विधानसभा की पांच सीटें
आती हैं, जिनके नाम डुमरियागंज, शोहरतगढ़, कपिलवस्तु, बंसी और इटावा हैं.
1952 में कांग्रेस के केडी मालवीय यहां के पहले सांसद थे. तब यह सीट गोंडा,
बस्ती के अंदर आती थी. इस सीट से कांग्रेस सात बार चुनाव जीत चुकी है.
1967 में नारायण स्वरूप शर्मा भारतीय जनसंघ से सांसद चुने गए और 1977 में
माधव प्रसाद त्रिपाठी भारतीय लोकदल से सांसद चुने गए. वहीं 1989 में बृज
भूषण तिवारी जनता दल से सांसद चुने गए. 1991 में BJP के रामपाल सिंह ने
चुनाव जीता. 1999 में मोहम्मद मुकीम BSP से सांसद रह चुके हैं. 2014 चुनाव
से पहले जगदंबिका पाल कांग्रेस छोड़कर BJP में शामिल हुए. जिसके बाद वह BJP
के टिकट पर इस सीट से जीतकर लोकसभा पहुंचे.
‘वन डे वंडर ऑफ इंडियन
पॉलिटिक्स’ के नाम से जगदंबिका पाल को जाना जाता है. दरअसल 1998 में
राजनीतिक हालात के चलते जगदंबिका पाल को एक दिन के लिए उत्तर प्रदेश का
मुख्यमंत्री बनाया गया था.
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसे रिसर्च केंद्र की योजना बनाई है जहां इस पृथ्वी को बचाने के नए रास्ते तलाशे जा सकें. इस रिसर्च में ऐसे तरीकों की खोज की जाएगी जिससे ध्रुवों की पिघल रही बर्फ को फिर से जमाया जा सके और वातावरण से कार्बन डाई ऑक्साइड निकाली जा सके. इस केंद्र को इस लिए बनाया जा रहा है क्योंकि वर्तमान समय में पृथ्वी पर ग्लोबल वॉर्मिंग के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए उठाए जा रहे क़दम नाकाफ़ी लग रहे हैं. यह पहल ब्रितानी सरकार के पूर्व मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार, प्रोफेसर सर डेविड किंग की ओर से कराई जा रही है. उन्होंने बीबीसी से कहा, ”आने वाले 10 सालों में हम जो भी करेंगे वह मानव जाति के अगले दस हज़ार सालों का भविष्य तय करेगा. इस दुनिया में ऐसा कोई भी एक केंद्र नहीं है दो इस बेहद महत्वपूर्ण विषय पर फ़ोकस हो.” कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के जलवायु वैज्ञानिक डॉक्टर एमिली शुकबर्ग ने कहा, ”नए सेंटर का मिशन जलवायु समस्या को हल करना होना चाहिए और हम उस पर विफ़ल नहीं हो सकते.” सेंटर फॉर क्लाइमेट रिपेयर कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के कार्बन न्यूट्रल फ्यूचर्स इनिशिएटिव का हिस्सा है, जिसका नेतृत्व डॉक्टर शुकबर्ग कर रही हैं. ये मुहिम सामाजिक वैज्ञानिकों, वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को एक साथ लाएगी. डॉक्टर शुकबर्ग ने बीबीसी को बताया, “यह वास्तव में हमारे समय की सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक है, और हम जानते हैं कि हमें अपने सभी कोशिशों के साथ इसका जवाब देने की आवश्यकता है.” ध्रुवों की बर्फ़ दोबारा जमाना ध्रुवों पर बर्फ़ को जमाने की कोशिशों में सबसे कारगर कदमों में से एक होगा इनके ऊपर पड़ने वाले बादलों को “चमकदार” करना है. इसके लिए बेहद पतली नली के माध्यम से बिना मानव रहित जहाजों पर लगाया जाएगा और समुद्री पानी को को पंप से खींचा जाएगा. इससे नमक के कण नली में आएंगे. इन नमक को बादलों तक पहुंचाया जाएगा. इससे बादल गर्मी को और भी ज़्यादा रिफ़्लेक्ट कर सकेंगे. CO2 को रिसाइकल करना जलवायु परिवर्तन से निपटने का एक और अहम तरीका है ‘ कार्बन कैप्चर और स्टोरेज’ जिसे सीसीएस कहते हैं.