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खराब स्वास्थ्य प्रदर्शन करने वाले 14 राज्यों पर गिरेगी गाज, बजट में होगी कटौती

खास बातें

  • 16 राज्यों में नहीं सुधरे हालात, 20 में बेहतर प्रदर्शन : नीति आयोग
  • दिल्ली, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर के हालात गंभीर
  • हरियाणा-पंजाब में स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर, मिलेगी अतिरिक्त मदद
  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत मिलता है करोड़ों रुपये का बजट
  • यूपी में हुआ सुधार, चार राज्यों को मंत्रालय ने मदद से किया बाहर

स्वास्थ्य के क्षेत्र में खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों के खिलाफ केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बड़ा कदम उठाया है। मंत्रालय जल्द ही इन राज्यों को मिलने वाली सालाना आर्थिक मदद में कटौती करने जा रहा है। नीति आयोग की रिपोर्ट में करीब 14 राज्यों का प्रदर्शन सबसे खराब मिला है। इन राज्यों में देश की राजधानी दिल्ली सहित उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर तक शामिल है। जबकि हरियाणा और पंजाब की स्थिति में काफी सुधार आया है और इनकी रैंकिंग भी सुधरी है। मंत्रालय ने इन राज्यों को अतिरिक्त आर्थिक मदद करने का फैसला लिया है।

मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहतर बनाने के उद्देश्य से मंत्रालय ने पिछले साल रैकिंग सिस्टम शुरू किया था। इसकी रिपोर्ट अब जारी की गई है। इसमें दिल्ली सहित 10 राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं को पैनल्टी पर रखा है। 

चार राज्यों को किया गया बाहर

अधिकारी ने बताया कि चार राज्यों सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और नागालैंड को -20 अंकों के साथ बाहर कर दिया है। कुल 36 राज्य और केंद्र शासित राज्यों में जो राज्यों का प्रदर्शन न कम न सुधार मिला है। जबकि शेष 20 राज्यों को अतिरिक्त मदद की जाएगी।

मंत्रालय के अनुसार राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत राज्यों को स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आर्थिक मदद सालाना की जाती है। करीब 3265 करोड़ रुपये के इस बजट को सभी राज्यों को आवंटित किया जाता है। बावजूद इसके स्वास्थ्य सेवाओं में बदलाव मंद गति से देखने को मिल रहा है। इसीलिए 7 बिंदुओं के मानकों पर सभी राज्यों का आंकलन करने के बाद रिपोर्ट तैयार की है। जिन राज्यों का प्रदर्शन खराब है उन्हें इस बार 20 फीसदी तक बजट में कटौती की जाएगी।

सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले छह राज्य

राज्यअंक
दादर एवं नागर हवेली 14
हरियाणा13
असम12
केरल08
पंजाब08
आंध्र प्रदेश07

सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले छह राज्य

राज्यअंक
पश्चिम बंगाल-7
मध्यप्रदेश-7
उत्तराखंड-8
बिहार-12
लक्षद्वीप-12
दिल्ली-5

(बाहर किए चार राज्य इसमें शामिल नहीं हैं)

अंडमान निकोबार और राजस्थान को शून्य अंक मिला है। इसका मतलब इनके बजट में कटौती नहीं होगी, लेकिन इन्हें चेतावनी जरूर मिली है।

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अखिलेश यादव बोले, यूपी में कानून व्यवस्था ध्वस्त, नौजवान परेशान

सपा प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा है कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो गई है। पहले उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बनने की राह पर था अब भाजपा राज ने ‘हत्या प्रदेश’ बना दिया है। अखिलेश ने रविवार को पत्रकारों से बातचीत में यह बात कही। उन्होंने कहा कि कानून व्यवस्था पूरी तरह बर्बाद है। अब अर्थव्यवस्था पर भी मंदी के काले बादल मंडरा रहे हैं। वाहन उद्योग में गिरावट है। इस क्षेत्र में 3.5 लाख से ज्यादा कर्मचारियों की छंटनी हो गई है। भाजपा सरकार कौन सी नीति पर काम कर रही है कि नौकरियां जा रही है और बेकारी बेतहाशा बढ़ रही है। नौजवान परेशान हैं। 

अखिलेश ने कहा कि जाति आधारित जनगणना होने पर ही सबको आनुपातिक आधार पर भागीदारी मिल सकती है। श्री यादव ने कहा कि श्रम ब्यूरो के सर्वे के मुताबिक 6 वर्षों में 3.7 करोड़ लोग किसानी के काम से अलग हो गए है। बीते 5 सालों में करीब 60 हजार किसानों ने आत्महत्या की है। एक करोड़ से ज्यादा नौकरियां चली गई। उन्होंने कहा कि भाजपा ने जनता को बहुत दुःख पहुंचाया है। किसानों और नौजवानों के भविष्य को घोर अंधकार के भंवर में फंसा दिया है।

रूस: मॉस्को के पास पावर स्टेशन में भीषण आग, 50 मीटर तक उठ रहीं लपटें

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मॉस्को के पास मितशची में स्थित पॉवर स्टेशन में लगी आग से 50 मीटर ऊंची लपटों की तस्वीर सामने आ रही है. रूसी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अभी तक इस घटना में 8 लोग घायल हो गए हैं.

सोशल मीडिया पर इस घटना की तस्वीरें और वीडियो वायरल होने लगे हैं. जिनमें ये देखा जा सकता है कि आग कितनी भयानक है. रूस के इमरजेंसी मंत्रालय की तरफ से बताया गया है कि पावर स्टेशन के अंदर जो हाई प्रेशर गैस पंप है, उसमें आग लगी है. इसकी वजह से आसपास की बिल्डिंग में भी असर फैल सकता है.

घटना को देखते हुए फायर ब्रिगेड की कई गाड़ियां मौके पर पहुंच गई हैं और आग पर काबू पाने की कोशिश की जा रही है.

अगगर इस पावर स्टेशन की बात करें तो ये 1992 से काम कर रहा है. इस स्टेशन की कैपेसिटी 1068 मेगावाट है. यहां अधिकतर प्राकृतिक गैस का ही इस्तेमाल होता है. मितशची रूस की राजधानी मॉस्को से सिर्फ 20 किमी. ही दूर है.

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ओमान पाकिस्तानी बलूचों को नौकरी क्यों नहीं दे रहा

“मैंने अपनी ज़िन्दगी के पाँच साल इस इंतज़ार में गुज़ारे हैं कि कहीं से मेरी नौकरी को लेकर कोई जवाब आएगा. लेकिन अब तक किसी ने कुछ भी नहीं बताया है और ऐसा महसूस कराया जा रहा है जैसे मैं कुछ ग़लत करने जा रहा हूं.”

25 साल के गहराम बलोच का ये बयान ओमानी फ़ौज में भर्ती होने के लिए इंटरव्यू को लेकर है. वो 330 से ज़्यादा के क़रीब बलूच नौजवानों में से एक हैं जो नौकरी के लिए इंटरव्यू के पाँच साल बाद भी जवाब के इंतज़ार में हैं.

एक पाकिस्तानी शहरी का एक दूसरे देश की फ़ौज में भर्ती का ख़्वाहिशमंद होना शायद आपको अजीब लगे लेकिन पाकिस्तान के सूबे बलूचिस्तान के तटीय क्षेत्र ग्वादर के लोगों के लिए खाड़ी देश ओमान में नौकरी की ख़्वाहिश कोई अजीब चीज़ नहीं है.

बलूचिस्तान से ओमान जाने वालों में बड़ी संख्या छात्रों और मेहनतकशों की रही है. हालांकि पिछले कुछ सालों में ये प्रक्रिया अपने अंत तक पहुंचती नज़र आ रही है.

ओमानी अधिकारियों की तरफ़ से बलूच नौजवानों की अपनी फ़ौज में आख़िरी बाक़ायदा भर्ती तो 1999 में की गई थी जबकि उसके बाद 2014 में जिन लोगों के इंटरव्यू लिए गए उन्हें आज तक जवाब नहीं दिया गया.

इस बारे में वर्ल्ड बैंक की अप्रैल 2019 में प्रकाशित होने वाली रिपोर्ट के मुताबिक़, खाड़ी देशों में दक्षिणी एशिया से मज़दूरों के जाने की प्रक्रिया बहुत हद तक कम हो गई है.

इन देशों में ओमान का नाम भी लिया गया है जहां रिपोर्ट के मुताबिक़ मेहनतकशों की भर्तियों की प्रक्रिया में कमी की एक वजह वहां पर होने वाली ‘ओमानाइज़ेशन’ है, जिसका मतलब किसी भी तरह की भर्तियां करते वक़्त अपने शहरियों को तरजीह देना है. Image caption पाकिस्तान और ओमान के बीच समझौते में यह तय किया गया था कि बलूच के लोगों को ओमान फ़ौज में भर्ती किया जाएगा

ओमान और ग्वादर के संबंधों का इतिहास

बलूचिस्तान और ओमान सल्तनत के संबंध ख़ासे पुराने हैं. एक अनुमान के मुताबिक़, मकरानी बलूच ओमान की आबादी का 25 फ़ीसद हिस्सा हैं और इन्हें वहां अलबलूशी पुकारा जाता है.

1908 में प्रकाशित होने वाली किताब ‘गजेटियर ऑफ़ परशियन गल्फ़, ओमान एंड सेन्ट्रल अरबिया’ अरब और फ़ारस की खाड़ी में काम करने वाले ब्रिटिश दूतावास के कर्मचारियों के लिए इलाक़े के बारे में जानकारी के लिए ख़ासा महत्वपूर्ण समझा जाता था.

इसके लेखक जॉन लारिमर के मुताबिक़ 18वीं सदी में ख़ान ऑफ़ क़लात नूरी नसीर ख़ान के दौर में ओमान के एक शहज़ादे ‘बाहोट’ बनकर यानी पनाह की तलाश में इनके पास आए थे.

शहज़ादे ने अपनी सल्तनत वापस हासिल करने के लिए बलूचिस्तान से मदद की गुज़ारिश की थी लेकिन नूरी नसीर ख़ान इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते थे.

बीबीसी से बात करते हुए शोधकर्ता और प्रोफ़ेसर हफ़ीज़ जमाली का कहना था, “ख़ान ऑफ़ क़लात ने उस वक़्त ग्वादर के बंदरगाह जो तब महत्वहीन था उनको तोहफ़े के तौर पर दे दिया ताकि इससे होने वाली आमदनी से वो अपना गुज़ारा कर सकें. फिर ग्वादर बाक़ायदा तौर पर ओमानी सल्तनत का हिस्सा बन गया.”

हालांकि बलोच राष्ट्रवादी इस बयान को नहीं मानते और उनका मानना है कि ओमानी शहज़ादे को ग्वादर अस्थायी तौर पर उनकी हिफ़ाज़त के लिए दिया गया था और उन लोगों को ग्वादर पर पूरा हक़ हासिल नहीं था.

बलूचिस्तान के तटीय इलाक़े ग्वादर को देखा जाए तो वहां आज भी ओमानी दौर के क़िले सदियों पुराने शाही बाज़ार में नज़र आते हैं. ये ग्वादर के एक दौर की तस्वीर पेश करते हैं जब सरहदें सिर्फ़ एक लकीर समझी जाती थीं और सफ़र दुश्वार होने के बावजूद लोग काम की वजह से विभिन्न देशों में आते-जाते रहते थे.

गहराम बलोच के ख़ानदान से संबंध रखने वाले कई लोग भी ऐसे ही ज़माने में वहां चले गए थे जब ओमानी फ़ौज में काम करने के कारण ओमान की नागरिकता मिलना ख़ासा आसान था.

प्रोफ़ेसर हफ़ीज़ जमाली ने जॉन लारिमर की लिखी हुई बात दोहराते हुए कहा कि ‘जब ओमानी सल्तनत का फैलाव हुआ यानी जब ओमान ने अफ़्रीका और भारत के समुद्र तक अपना क़ब्ज़ा जमाया तो मकरान के बलोच बतौर सिपाही ओमान के फैलाव में एक अहम किरदार निभाते हुए उभरे.’

ओमानी फ़ौज में बलोच सिपाही

जब 1947 के बाद भारत और पाकिस्तान दो आज़ाद देश बने तो पाकिस्तान सरकार ने ओमान की सल्तनत से ग्वादर को अपनी ज़मीन से नज़दीक होने की बुनियाद पर ख़रीदने की बात की. यह अनुबंध सन् 1958 में तय पाया जिसके तहत पाकिस्तान ने ओमान से ग्वादर 84 लाख डॉलर में ख़रीद लिया.

इस अनुबंध में यह भी तय किया गया था कि बलूचिस्तान के लोगों को ओमानी फ़ौज में भर्ती किया जाएगा. इस नियम पर अमल भी हुआ लेकिन 1958 के बाद नियम सिर्फ़ नियम भर रह गया.

इसकी वजह प्रोफ़ेसर हफ़ीज़ जमाली ने बताई, “ओमानी सल्तनत पहले जिन लोगों को भर्ती करती थी वो आस-पास के इलाक़ों को जीतने के इरादे से करती थी जिसमें उन्हें प्रशासन संभालने के लिए लोगों की ज़रूरत पड़ती थी. 1958 के बाद तो ओमानी सल्तनत ख़ुद खाड़ी द्वीप तक सीमित रह गई तो अफ़्रीक़ी इलाक़े मुमबासा और ज़ेनजीबार जहां बलोच सिपाहियों ने जाकर ओमानियों की तरफ़ से व्यवस्था संभाली वो इनसे अलग हो गए क्योंकि उस समय दुनिया भर में तब्दीलियां आई थीं.”

इस स्थिति में ओमान को बलोच सिपाहियों की ज़रूरत नहीं रही लेकिन प्रतीकात्मक बुनियादों पर कम संख्या में भर्तियां जारी रहीं.

हफ़ीज़ जमाली ने बताया, “उस दौरान बलोच सिपाहियों की एक ख़ास तादाद की ज़रूरत उस समय पेश आई थी जब 1970 के दशक में ओमान में स्थानीय बग़ावत हुई थी. इस बग़ावत से निपटने के लिए लोगों की भर्तियां करनी पड़ी थीं लेकिन ये वक़्ती भर्तियां थीं जो इस मसले के हल के बाद ख़त्म हो गई थीं.”

बलूचिस्तान का विद्रोह और ओमान में नौकरियां

जब 1970 के दशक में तेल की खोज हुई और तो ग्वादर और मकरान के लोगों की दिलचस्पी ओमान जाने में और बढ़ गई. इस पर ओमाम की तरफ़ से प्रतिबंध लगाई गई कि अब नए लोगों को नागरिकता नहीं दी जाएगी.

प्रतीकात्मक बुनियादों पर ओमानी फ़ौज में भर्तियां बहुत हद तक कम होने की एक वजह बलूचिस्तान में विद्रोह से जुड़ी है.

बलूचिस्तान के इलाक़े कैच में ओमानी फ़ौज में भर्ती होने के लिए आस लगाए बैठे लोगों में बलिख शेर भी हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि ‘इंटरव्यू के दौरान मुझ से सैन्य प्रवक्ता ने कहा कि अगर हम आपको ओमान जाने देते हैं तो क्या आप वहां पर ली गई फौजी ट्रेनिंग पाकिस्तान के ख़िलाफ़ इस्तेमाल तो नहीं करेंगे?’

बलिख शेर का कहना था कि ‘मेरे पास इस बात का जवाब नहीं था, सिवाए हैरानी ज़ाहिर करने के क्योंकि मैं सिर्फ़ नौकरी के लिए वहां जाना चाहता हूं. मुझे इंटरव्यू से ज़्यादा तफ़्तीश लग रही थी. अब मैं ज़्यादा ख़ौफ़ज़दा हूं.’

शोधकर्ताओं का मानना है कि कहीं न कहीं ये शक हर देश में पाया जाता है. शोधकर्ता अमीम लुत्फ़ी की रिसर्च ओमानी बलोच और खाड़ी देशों में उनके रिहाइश के गिर्द घूमती है.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि ‘इसकी वजह दुबई, शारजा, मस्कट और बहरैन में चंद ऐसी जगहें हैं जो अलगाववादी सोच रखने वाले लोगों के गढ़ कहलाते हैं.’

अमीम का कहना था कि ‘इनमें से जो गिरोह ईरान विरोधी हैं उनका खाड़ी देश भी साथ देते हैं लेकिन साथ ही इस बात का भी ख़ास ख्याल रखते हैं कि पाकिस्तान विरोधी प्रोपेगंडा को पनपने न दें.’

इसकी एक और वजह फ़ौजी फाउंडेशन का भर्तियों के मामले में पेश होना है. सन् 2010 में फ़ौजी फाउंडेशन के विदेशों में भर्तियों के लिए एक फ़र्म बनाई थी ताकि बलूचिस्तान और अन्य इलाक़ों के बेशुमार लोग निजी संबंध के बजाए इनके ज़रिए बाहर जाएं.

लेकिन अमीम के मुताबिक़ ‘इस अमल का मक़सद विदेशी फ़ौज में भर्तियों को ख़त्म करना था जो बहुत हद तक हो चुका है.’

जानकारों के मुताबिक़ इस समय दुनिया भर में मॉडर्न मिलिट्राइज़ेशन का रूझान देखने में आ रहा है जिसके नतीजे में खाड़ी देशों और ख़ासकर ओमान ऐसे लोगों को भर्ती करना चाह रहा है जो सही तरीक़े से प्रशिक्षित हो वर्ना वो अपने लोगों पर संतोष करना चाहता है.

हम जहां हैं, वहीं ठीक हैं’

ओमान के शहर मस्कट के देशी इलाक़े वादिये हतात में ज़्यादातर आबादी तिरबत और ग्वादर से आने वाले लोगों की है.

गहराम और बलिख शेर के ज़्यादातर रिश्तेदार इसी इलाक़े से संबंध रखते हैं लेकिन अब गहराम ओमान जाने के बारे में उम्मीद नहीं रखते. अब वो बच्चों को पढ़ाकर अपना गुज़ारा करना चाहते हैं.

इनके मुताबिक़ ‘दूसरे देश की फौज में भर्ती होकर मैं अपने देश में रहने वाले अपने मां-बाप और रिश्तेदारों को रूस्वा नहीं करना चाहता. मैं इसके लिए तैयार नहीं हूं. मैं जहां हूं, वहीं ठीक हूं.’

इधर बलिख शेर का कहना था कि ‘हम दुनिया के किसी भी मुल्क चले जाएं हमें शक की निगाह से ही देखा जाता है. इसकी एक वजह हमारे देश का हमारे ख़िलाफ़ पक्षपाती रवैया है.’

Dubai set to become innovation hub; woos Indian entrepreneurs

Selected startups will get business licences and office set-up in Dubai

Looking to transform itself into an innovation hub, Dubai is wooing entrepreneurs from India, the third biggest startup base in the world, to set up shops in the emirate.

The focus is on technology-driven startups, wherein the authorities are offering easier business licences, office spaces and access to funding.

Dubai grew to prominence first as a trading hub, and then as a construction, tourism and manufacturing centre. However, it grew at 1.9 per cent in 2018, the slowest growth since the post-crisis time in 2010.

“When we decided to launch the programme of attracting overseas startups here, naturally the first choice was India, as 30 per cent co-founders of our Dubai Startup Hub have Indian origin,” Natalia Sycheva, manager, entrepreneurship department of Dubai Chamber of Commerce said.

“We have a strong focus on India and we realise how our incubators will benefit from Indian talent,” she said, adding that the chamber has launched Dubai Startup Hub to attract startups here.

“We would like to have around a couple of hundreds of startups, to bring their businesses to Dubai,” she added.

They are looking at companies in emerging technologies like blockchain, artificial intelligence and digital transformations, with a focus on how their solutions can be applied to help the local economy, she said.

These startups should bring changes in e-commerce, constction, logistics and retail sectors, she said.

The hub organised roadshows at the Indian startup capital of Bengaluru and Delhi last month to identify and attract high-potential startups from India.

Selected startups will get business licences and an office set-up in Dubai as well as assistance in getting access to various government or private sector funding, she said.

Sycheva added that efforts are also on to get startups from different African countries.

The chamber feels that there is a lot of potential for the growth of trade between India and the United Arab Emirates (UAE).

“India is Dubai’s second-largest trading partner with $31.4 billion worth of bilateral non-oil trade in 2018, a 17 per cent increase compared to the previous year. But we see a lot of opportunity in the increase of this figure in coming future,” she said.

The local government is expecting approximately 1.5 per cent of the UAE’s annual forecast of the gross domestic product (GDP) during the six months of the Dubai Expo 2020 to be held next year, Jon Bramley, vice president, communication of the Dubai Expo 2020 said.

He said India is participating in a big way at the Expo, which will feature 192 individual country pavilions in 4.38 square km area.

The World Expo is one of the world’s oldest and largest international events, taking place every five years and lasting for six months, which serve as a bridge between governments, companies, international organisations and citizens.