EVM: कैसा है पोलिंग बूथ से स्ट्रॉन्ग रूम तक का चक्रव्यूह

मतगणना से पहले ईवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को लेकर विपक्षी पार्टियों में अविश्वास का माहौल और बढ़ गया है. मंगवार को 22 विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग से संपर्क कर ईवीएम को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी.

हालांकि चुनाव आयोग ने विपक्षी पार्टियों के आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया. क्या मतदान केंद्र से स्ट्रॉन्ग रूम तक की यात्रा में वाक़ई ईवीएम की सुरक्षा चिंताजनक होती है? क्या चुनाव आयोग के चक्रव्यू को भेदना इतना आसान है? जानिए ईवीएम की सुरक्षा में चूक चुनाव आयोग की हो रही है प्रत्याशियों की सतर्कता में कमी है?
स्ट्रॉन्ग रूम कितना स्ट्रॉन्ग

स्ट्रॉन्ग रूम का मतलब है कि वैसा कमरा जहां की सुरक्षा अचूक है और अनाधिकारिक लोगों की पहुंच असंभव है. भारतीय चुनाव में स्ट्रॉन्ग रूम का मतलब निष्पक्ष और पारदर्शी मतदान और वोटों की गिनती से है.

मतदान के बाद ईवीएम स्ट्रॉन्ग रूम में रखी जाती है और इनकी सुरक्षा के लिए चुनाव आयोग पूरी तरह से चाक-चौबंद रहता है. देश भर की स्ट्रॉन्ग रूम में ईवीएम की सुरक्षा चुनाव आयोग तीन स्तरों पर करता है.

इसकी सुरक्षा के लिए केंद्रीय अर्द्ध सैनिक बलों की तैनाती रहती है. केंद्रीय बल स्ट्रॉन्ग रूम के भीतर की सुरक्षा देखते हैं जबकि बाहर की सुरक्षा राज्य पुलिस बलों के हाथों में होती है.

निगरानी कितनी कड़ी?

स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा की निगरानी ज़िले के डीएम और एसपी के हाथों में होती है. स्ट्रॉन्ग रूम की सीलिंग के वक़्त राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि मौजूद रहते हैं. इन प्रतिनिधियों को भी अपनी तरफ़ से सील लगाने का प्रावधान होता है.

स्ट्रॉन्ग रूम में केवल एक तरफ़ से एंट्री होनी चाहिए और इसमें डबल लॉक सिस्टम होता है. एक चाबी रिटर्निंग ऑफिसर के पास होती है और दूसरी चाबी संबंधित लोकसभा क्षेत्र के असिस्टेंट रिटर्निंग ऑफिसर के पास होती है.

अगर किसी स्ट्रॉन्ग रूम कोई दूसरी एंट्री है, वो चाहे खिड़की ही क्यों न हो तो इसे सुनिश्चित करना होता है कि इससे किसी की पहुंच स्ट्रॉन्ग रूम तक ना हो.

कैमरे का पहरा

स्ट्रॉन्ग रूम के एंट्री पॉइंट पर सीसीटीवी कैमरा होता है. सुरक्षा बलों के पास एक लॉग बुक होती है जिसमें हर एंट्री का टाइम, तारीख़, अवधि और नाम का उल्लेख अनिवार्य रूप से करना होता है.

वो चाहें पर्यवेक्षक, एसपी, राजनीतिक पार्टी, प्रत्याशी, एजेंट या कोई अन्य व्यक्ति हो. अगर काउंटिंग हॉल स्ट्रॉन्ग रूम के पास है तो दोनों के बीच एक मज़बूत घेरा होता है ताकि स्ट्रॉन्ग रूम तक कोई चाहकर भी पहुंच न सके.

इन सारे मानकों का पालन हर हाल में करना होता है तभी चीज़ें आगे बढ़ती हैं. अगर काउंटिंग हॉल और स्ट्रॉन्ग रूम के बीच ज़्यादा दूरी है तो दोनों के बीच बैरकेडिंग होनी चाहिए और इसी के बीच से ईवीएम काउंटिंग हॉल तक पहुंचनी चाहिए.

वोटों की गिनती के दिन अतिरिक्त सीसीटीवी कैमरे लगाए जा सकते हैं. स्ट्रॉन्ग रूम से काउंटिंग हॉल तक ईवीएम ले जाने को रिकॉर्ड किया जाएगा ताकि कोई फेरबदल ना हो. स्ट्रॉन्ग रूम और काउंटिंग हॉल की लोकेशन को लेकर भी कई मानक हैं.

बेसमेंट, उसके पास कोई छत, किचन या कैंटीन, पानी टंकी और पंप रूम नहीं होने चाहिए. इसके अलावा सभी प्रत्याशियों को लिखित में सूचित किया जाता है कि वो अपने प्रतिनिधि को भेजकर सुनिश्चित हो जाएं कि स्ट्रॉन्ग रूम सुरक्षित है.

चुनाव के पहले ईवीएम कहां होती है?

एक ज़िले में उपलब्ध सभी ईवीएम डिस्ट्रिक्ट इलेक्टोरल ऑफिसर (डीईओ) की निगरानी में गोदाम में रखी होती है. गोदाम में डबल लॉक सिस्टम काम करता है. गोदाम की सुरक्षा में पुलिस बल हमेशा तैनात रहते हैं. इसके साथ ही सीसीटीवी सर्विलांस भी रहता है.

चुनाव से पहले गोदाम से एक भी ईवीएम चुनाव आयोग के आदेश के बिना बाहर नहीं जा सकती है. चुनाव के वक़्त ईवीएम की जांच पहले इंजीनियर करते हैं और यह जांच राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में होती है.

चुनाव की तारीख़ क़रीब आने के बाद ईवीएम बिना कोई क्रम के आवंटित की जाती है. इस वक़्त अगर राजनीतिक पार्टी के प्रतिनिधि मौजूद नहीं होते हैं तो आवंटित ईवीएम और वीवीपीएटी की लिस्ट राजनीतिक पार्टियों के कार्यालयों को सौंप दी जाती है. इसके बाद रिटर्निंग ऑफिसर की ज़िम्मेदारी स्टोर रूम और चिह्नित स्ट्रॉन्ग रूम की होती है.

अलग-अलग मतदान केंद्रों पर ईवीएम का आवंटन पार्टी प्रतिनिधियों की मौजूदगी में होती है. सारी ईवीएम मशीनों के सीरियल नंबर को पार्टियों से साझा किया जाता है. मतदान शुरू होने से पहले ईवीएम के नंबर का मिलान राजनीतिक पार्टियों के एजेंटों की मौजूदगी में की जाती है.

जब सारी मशीनें बैलट और कैंडिडेट्स के नामों और चुनाव चिह्नों से लैस हो जाती हैं तो स्ट्रॉन्ग रूम को पार्टी प्रतिनिधियों की मौजूदगी में सील कर दिया जाता है. एक बार स्ट्रॉन्ग रूम बंद होने के बाद तभी खुलता है जब मतदान केंद्रों पर ईवीएम पहुंचाई जाती है.

जब ईवीएम मतदान केंद्र के लिए रवाना की जाती है तो सभी राजनीतिक पार्टियों को सूचित किया जाता है. उनके साथ टाइम और तारीख़ को साझा किया जाता है. कुछ अतिरिक्त ईवीएम भी रखी जाती है ताकि कोई तकनीकी ख़राबी आने की सूरत में मशीन बदली जा सके.

मतदान केंद्र से स्ट्रॉन्ग रूम ईवीएम कैसे पहुंचती है?

मतदान ख़त्म होते ही मतदान केंद्र से तत्काल ईवीएम स्ट्रॉन्ग रूम नहीं भेजी जाती है. प्रीज़ाइडिंग ऑफिसर ईवीएम में वोटों के रिकॉर्ड का परीक्षण करता है. सभी प्रत्याशियों के पोलिंग एजेंट को एक सत्यापित कॉपी दी जाती है.

इसके बाद ईवीएम को सील कर दिया जाता है. प्रत्याशियों या उनके पोलिंग एजेंट सील होने के बाद अपना हस्ताक्षर करते हैं. प्रत्याशी या उनके प्रतिनिधि मतदान केंद्र से स्ट्रॉन्ग रूम ईवीएम के साथ जाते हैं.

अतिरिक्त ईवीएम भी इस्तेमाल की गई ईवीएम के साथ ही स्ट्रॉन्ग रूम तक आने चाहिए. जब सारी ईवीएम आ जाती है तो स्ट्रॉन्ग रूम सील कर दी जाती है. यहां प्रत्याशियों के प्रतिनिधि को अपनी तरफ़ से भी सील लगाने की अनुमति होती है.

इसके साथ ही प्रत्याशियों को स्ट्रॉन्ग रूम की देखरेख की अनुमति होती है. एक बार स्ट्रॉन्ग रूम सील होने के बाद गिनती के दिन की सुबह ही खोला जाता है. अगर विशेष परिस्थिति में स्ट्रॉन्ग रूम खोला जा रहा है तो यह प्रत्याशियों की मौजूदगी में ही संभव हो पाएगा.

राघव चड्ढा का बीजेपी पर बड़ा आरोप- ‘EVM मशीन बदलने के लिए EXIT पोल में जीत की हवा’

साउथ दिल्ली से ‘आप’ उम्मीदवार राघव चड्ढा ने एक्ज़िट पोल के उलट जीत का दावा किया है. राघव चड्ढा ने कहा, पिछले कई चुनाव में एग्ज़िट पोल के उलट परिणाम आए हैं.

लोकसभा चुनाव के लिए मतदान संपन्न होने के बाद आए एग्ज़िट पोल से विपक्ष में अफरा तफरी देखने को मिल रही है. ऐसा ही कुछ आम आदमी पार्टी में भी देखने को मिल रहा है. साउथ दिल्ली से ‘आप’ उम्मीदवार राघव चड्ढा ने एक्ज़िट पोल के उलट जीत का दावा किया है.

राघव चड्ढा ने कहा, पिछले कई चुनाव में एग्ज़िट पोल के उलट परिणाम आए हैं. हालांकि जीत के दावे के बीच राघव ने भाजपा पर एक बड़ा आरोप लगाया है. ‘आजतक’ से बातचीत के दौरान एग्ज़िट पोल सवाल खड़े करते हुए राघव चड्ढा ने कहा कि “बीजेपी 1998 से अबतक हर Exit पोल जीतते आई है, लेकिन कई चुनाव हारी है.”

“भाजपा के मतदाता को हमेशा ज्यादा और आम आदमी पार्टी के मतदाता को कम आंका जाता है. 2013 में 6 सीटें बताईं लेकिन आईं 28, 2014 लोकसभा में शून्य सीटें बताईं लेकिन आईं 4 सीटें, 2015 विधानसभा में 25 सीट बताईं लेकिन 70 में से 67 सीट आईं.”

राघव ने आगे बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा, “2019 में वोट डालने के बाद मतदाता से पूछा जाता है तो मतदाता घबरा जाता है, इस घबराहट में मतदाता बीजेपी को वोट देने की बात कहता है लेकिन वो बीजेपी को वोट देता नहीं है, ये डर बीजेपी सरकार ने मतदाता के दिमाग मे डाल दिया है.”

दिल्ली के एग्जिट पोल में हार नज़र आने के सवाल पर राघव चड्ढा ने 23 मई का इंतज़ार करने की बात कही. राघव ने कहा, “अभी नतीजों का इंतजार करना चाहिए, हर राजनीतिक दल का एक आकलन होता है कि कहां से वोट आए, कहां गए. मेरा मानना है कि 23 मई को रिजल्ट आने के बाद एग्ज़िट पोल को चुल्लू भर पानी में डूबना पड़ेगा. हम 11 महीने ज़मीन पर रहे हैं, दिल्ली में कई आंकड़े गलत साबित होंगे, तन मन धन से काम किया है और जमीन पर रिश्ते बनाए हैं.”

हालांकि बातचीत के अंत में राघव EVM पर सवाल खड़े करना नहीं भूले. उन्होंने बीजेपी पर बड़ा आरोप लगाते हुए कहा, “ममता बनर्जी ने गंभीर बात कही है कि Exit पोल में भाजपा की ज्यादा सीट दिखाकर एक हवा बना दी जाए और पीछे से EVM मशीन बदल दी जाए और जब नतीजे आएं तो कोई EVM पर सवाल न खड़ा कर सके. EVM मशीन बदलने के लिए, EXIT पोल को आधार बनाया गया है. चुनाव जीतने के लिए बीजेपी हर गैर कानूनी काम कर रही है, चाहे मशीन से छेड़छाड़ हो या मशीन बदलना हो.”

आपको बता दें कि दिल्ली में 12 मई को लोकसभा चुनाव हुए थे. इसके बाद 19 मई को अंतिम चरण का चुनाव ख़त्म होने के बाद सामने आए एग्जिट पोल में आम आदमी पार्टी दिल्ली की सातों सीटों पर काफी पीछे नज़र आ रही है. हालांकि बीजेपी जहां एग्जिट पोल से खुश है तो वहीं, विपक्षी दल एग्जिट पोल को गलत ठहराते हुए 23 मई का इंतज़ार कर रहे हैं.

अशोक लवासा से मतभेद पर सामने आए मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा

चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के आदर्श आचार संहिता की बैठकों में शामिल होने से इनकार की रिपोर्ट पर नया विवाद खड़ा हो गया है.

कहा जा रहा है कि लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर बैठकों से अलग रहने की जानकारी दी है.

मीडिया में आई रिपोर्ट्स के अनुसार लवासा ने लिखा है, “जब मेरे अल्पमत को दर्ज नहीं किया जा रहा तब आयोग में हुई बैठकों में मेरी हिस्सेदारी का कोई मतलब नहीं है.”

लवासा की चिट्ठी की ख़बरें मीडिया में आने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ने बयान जारी कर इसे गैरज़रूरी विवाद बताया है.

मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कहा है, “आदर्श आचार संहिता को लेकर चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यशैली के बारे में आज मीडिया के एक हिस्से में अनावश्यक विवाद की ख़बरें आई हैं.”

सुनील अरोड़ा ने अपने बयान में कहा है, “चुनाव आयोग में तीनों सदस्य एक दूसरे के क्लोन नहीं हो सकते. ऐसे कई मौक़े आए हैं जब विचारों में मतभेद रहा है. ऐसा हो सकता है और होना भी चाहिए. लेकिन ये बातें चुनाव आयोग के अंदर ही रहीं. जब भी सार्वजनिक बहस की ज़रूरत हुई, मैंने निजी तौर पर उससे मुंह नहीं मोड़ा है लेकिन हर चीज़ का समय होता है.”

कांग्रेस ने इसे चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न क़रार दिया है.

समाचार एजेंसी एएनआई से कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, “चुनाव आयोग मोदी जी का कठपुतली बन चुका है. अशोक लवासा जी की चिट्ठी से साफ़ है कि मोदी और अमित शाह को लेकर जो उनके विचार हैं, उन्हें भी रिकॉर्ड नहीं किया जा रहा है.”

लवासा की चिट्ठी?
मीडिया में आई ख़बरों के अनुसार अशोक लवासा ने 16 मई को मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखा है.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अपने पत्र में लवासा ने कहा है कि कई मामलों में उनके अल्पमत के फ़ैसले को दर्ज नहीं किया गया और लगातार इसे दबाया जाता रहा है, जो कि इस बहुसदस्यीय वैधानिक निकाय के स्थापित तौर तरीक़ों से उलट है.”
मुख्य चुनाव आयुक्त के अनुसार, केवल अर्द्ध क़ानूनी कार्यवाहियों के दौरान लिए गए फ़ैसले या आदेश में ही अल्पमत की राय रिकॉर्ड की जाती है और आदर्श आचार संहिता की शिकायतें अर्द्ध क़ानूनी कार्यवाहियों में नहीं आती हैं, इसलिए अल्पमत की राय रिकॉर्ड करना ज़रूरी नहीं है.

EC की क्लीन चिट पर आयोग में ही मतभेद, आयुक्त लवासा और CEC आमने-सामने

सूत्र बताते हैं कि चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को लिखे पत्र में यह बात भी कही है कि उनकी मांग के अनुरूप व्यवस्था नहीं बनने तक वह बैठक में ही शामिल नहीं होंगे. कई विवादित फैसले लेने के कारण चुनाव आयोग निशाने पर है.

लोकसभा चुनाव के खत्म होते-होते चुनाव आयोग में भी मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं. आयोग के आचार संहिता तोड़ने संबंधी कई फैसलों पर असहमति जताने वाले चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को पत्र लिखकर मांग की है कि आयोग के फैसलों में आयुक्तों के बीच मतभेद को भी आधिकारिक रिकॉर्ड पर शामिल किया जाए.

अशोक लवासा देश के अगले मुख्य चुनाव आयुक्त बनने की कतार में हैं और सूत्रों के मुताबिक लवासा आचार संहिता उल्लंघन की शिकायतों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को सीधे-सीधे लगातार क्लीन चिट और विरोधी दलों के नेताओं को नोटिस थमाए जाने के खिलाफ रहे हैं.

चुनाव आयोग में फैसले को लेकर हो रहे विवाद और लवासा की ओर से पत्र लिखे जाने को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कहा, ‘चुनाव आयोग में 3 सदस्य होते हैं और तीनों एक-दूसरे के क्लोन नहीं हो सकते. मैं किसी भी तरह के बहस से नहीं भागता. हर चीज का वक्त होता है.’

चुनाव आयोग मोदी का पिट्ठूः कांग्रेस

दूसरी ओर, इस विवाद पर कांग्रेस का कहना है कि चुनाव आयोग मोदी का पिट्ठू बना चुना है, अशोक लवासा की चिट्ठी से साफ है कि सीईसी और उनके सहयोगी लवासा के बीच नरेंद्र मोदी और अमित शाह को लेकर जो अलग मत है, उसे रिकॉर्ड करने को तैयार नहीं हैं.

इससे पहले सूत्रों के मुताबिक चुनाव आयोग की बैठक में अपने अलग मत की वजह से सुर्खियों में रहे अशोक लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त को लिखी चिट्ठी में कहा है कि 3 सदस्यीय आयोग में एक सदस्य का भी विचार भिन्न हो तो उसे आदेश में बाकायदा लिखा जाए. लवासा चुनाव आयोग में सुप्रीम कोर्ट जैसी व्यवस्था चाहते हैं. जिस तरह से कोर्ट की खंडपीठ या विशेष पीठ में किसी केस की सुनवाई के बाद फैसला सुनाते वक्त अगर किसी जज का फैसला सहमति से लिए गए फैसले के उलट रहता है तो भी  उसका फैसला रिकॉर्ड किया जाता है.

फैसला होने तक बैठक में नहीं

सूत्रों ने यह भी बताया कि अशोक लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को लिखे पत्र में यह बात भी कही है कि उनकी मांग के अनुरूप व्यवस्था नहीं बनने तक वह बैठक में ही शामिल नहीं होंगे.

हालांकि, चुनाव आयोग की नियमावली के मुताबिक तीनों आयुक्तों के अधिकार क्षेत्र और शक्तियां बराबर हैं. किसी भी मुद्दे पर विचार में मतभेद होने पर बहुमत का फैसला ही मान्य होगा. फिर चाहे मुख्य निर्वाचन आयुक्त ही अल्पमत में क्यों ना हों.

दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट भी चुनाव आयोग को अपने अधिकारों का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किए जाने पर डांट चुका है. आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन से संबंधित कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की ओर से आयोग में दाखिल शिकायतों का जल्द निपटारा नहीं किए जाने की आलोचना भी की. चुनाव आयोग नरेंद्र मोदी और अमित शाह को कई मामलों में क्लीन चिट दे चुका है. जबकि इन दोनों नेताओं के खिलाफ अपने चुनावी भाषणों में सेना की सर्जिकल स्ट्राइक का राजनीतिक जिक्र और विरोधियों के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे.

रिकॉर्ड रखने का आदेश

मोदी-शाह क्लीन चिट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के आदेशों को रिकॉर्ड पर रखने को कहा है. इस आदेश के बाद आयोग को अंदेशा है कि अगली सुनवाई में कोर्ट आयोग में होने वाली मीटिंग की प्रक्रिया और फैसले के आधार को लेकर तीखे और सीधे सवाल करेगा.

जारी लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग की भूमिका पर लगातार सवाल उठ रहे हैं. विपक्ष खुलकर आयोग पर आरोप लगा रहा है कि वह निष्पक्ष रूप से फैसले नहीं ले रहा. बंगाल में अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा के बाद बुधवार को चुनाव आयोग के तय समय से 20 घंटे पहले ही चुनाव प्रचार को रोक दिए जाने की भी तीखी आलोचना हुई थी.

इस फैसले के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया कि चुनाव आयोग मोदी और शाह के इशारे पर काम कर रहा है तो दूसरी ओर बीजेपी भी ऐसे ही आरोप लगाती रही है.

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डुमरियागंज- लोकसभा चुनाव

नेपाल राष्ट्र से सीमा साझा करने वाली यह संसदीय सीट जनपद सिद्धार्थनगर को कवर करती है। भाजपा के जगदंबिका पाल यहां से वर्तमान सांसद हैं। तथागत बुद्ध का क्रीड़ास्थल कपिलवस्‍तु भी यहीं है। इस क्षेत्र का सिद्धार्थनगर ‘काला नमक’ चावल के लिए दुनिया भर में काफी मशहूर है। आयरन और जिंक से भरपूर इन चावलों का ज़िक्र संयुक्त राष्ट्र की खाद्य और कृषि सम्बन्धी संस्था ने अपनी किताब ‘स्पेसिअलिटी राइस ऑफ वर्ल्ड’ में भी किया है।